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Sunday, December 27, 2015

हर व्यक्ति को कर्म करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था, 'हे अर्जुन तुम कर्म करने के लिए बाध्य हो, तुम्हें कर्म करना चाहिए। कर्म के बिना जीवन का किसी भी प्रकार निर्वाह नहीं हो सकता। आलस्य, दुर्बलता का त्याग करके खड़े हो जाओ और जो तेरा निहित कर्म है उसे करो। बगैर कर्म के इहलोक और परलोक, दोनों ही सार्थक नहीं हो सकते।
इसलिए इहलोक या परलोक, दोनों अवस्थाओं में कर्म के बगैर व्यक्ति नहीं रह सकता। इसलिए तू कर्म कर।Ó ये कथन भगवान कृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट तौर पर कहे थे कि तू बैरागी, त्यागी, ज्ञानवान आदि न होकर, केवल कर्म करने वाला बन, जबकि अर्जुन हर प्रकार से पात्र था। वह बल, बुद्धि, विवेक आदि गुणों को धारण करने वाला था। फिर भी भगवान ने अजरुन को कर्म में ही लगाया। ऐसा लगता है कि आज सत्ता में आसीन कुछ लोगों ने इस देश को कर्महीन बनाने का मन बना लिया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि महाराजा और राजा दोनों के प्रवचन में आज आलस्य के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता। ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों त्याग की बात करते हैं-एक जगत को मिथ्या कहकर त्यागने की बात कहता है तो दूसरा कर्म को मिथ्या कहकर कि हम तुम्हें एक रुपये प्रति किलोग्राम अन्न देंगे, जिसका अनुमानित मूल्य भी 16 रुपये से लेकर 20 रुपये तक है। इसे हम आपको निशुल्क भी देंगे और खर्चे के लिए कुछ जेब खर्च भी देंगे।
आज चारों ओर समाज के अनेक संचालक गण केवल लोगों को कर्महीन होने के लिए अग्रसर करते जा रहे हैं। आज भारत के कितने गांव-नगर के वासी यातायात, बिजली व पानी की सहूलियतों के बगैर परेशान हैं। आज आप बात करते हैं महानगरों की जहां आजादी से लेकर आज तक पर्याप्त बिजली उपलब्ध है। यदि यही बिजली गांव को भी दी जाती तो वहां भी अच्छा शहर बसा होता, न कोई अनुदान चाहता और न कोई भीख मांगता, बल्कि आज सरकार को टैक्स के रूप में देश के विकास के लिए धन मिल रहा होता। समय बदला है, रहन-सहन बदला है, भेष-भूषा, यातायात, सेल फोन की संक्षिप्त बोलचाल आदि सभी बदले हैं तो आपको भी आलस्य छोड़कर बदलना होगा।
जो लोग अपने को बदल लेते हंै वे सब कुछ पा लेते हंै और जो अपने को असहाय समझते हैं, वे दूसरों पर निर्भर रह जाते हैं। इसलिए हर व्यक्ति को कर्म करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।


Written by: ज्योतिषाचार्य “पंकज कुमार” 

Saturday, December 26, 2015

गीता

गीता के एक-एक शब्द मे सत्य हैं!
सदैव संदेह करने वाले व्यक्ति के लिये प्सन्नता ना इस लोक मे हैं ना हि कहीं और !

Dadi Janki‬

"Serve through your face. Simply smile.
When you smile, the other person smiles back

सब सुखी हों- यह भावना होनी चाहिए

एक अच्छी और सच्ची जिंदगी जीने के लिए मनुष्य के पास उन रास्तों का ज्ञान होना बहुत जरूरी है, जो उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचाते हैं। इन्हीं रास्तों पर आगे बढ़ते हुए हर मनुष्य की सब सुखी हों- यह भावना होनी चाहिए। हम अपने कर्म और वाणी से ऐसा एक भी शब्द न निकालें और न ऐसा कृत्य करें, जो दूसरों को कष्ट पहुंचाता हो।
यह वाणी के संयम और कर्म के विवेक से ही संभव हो सकता है, लेकिन हमारी स्थिति आज उस सुंदरी की तरह है, जो चाहती है कि सारी दुनिया उसे प्यार करे परंतु वह किसी को प्यार न करे। अक्सर हम भूल जाते हैं कि यह संसार आदान-प्रदान पर चलता है। जैसा हम बोएंगे, वैसा फल हमें मिलेगा। पाश्चात्य दार्शनिक वेंडल विल्की ने लिखा था कि जिस प्रेम, सहिष्णुता, परदुखकातरता, परोपकार, संवेदना और भाईचारे की जरूरत है, उसका लोगों में अभाव है। विल्की का स्वप्न अधूरा ही रह गया। यह स्वप्न कोरा विल्की का ही नहीं महावीर, बुद्ध, गांधी, आचार्य तुलसी जैसे महापुरुषों का भी था, जो अधूरा ही रह गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि आपसी प्रेम और आपसी मेल का अपना महत्व है और उससे वह शक्ति उत्पन्न होती है, जो और किसी चीज से पैदा नहीं हो सकती, लेकिन आज का मानव व्यापक हितों को नजरअंदाज कर अपने निजी स्वार्थों को देख रहा है। वर्तमान समय की सारी व्याधियां इन्हीं क्षुद्र स्वार्थों और संकीर्ण मानसिकता के कारण हैं।
संसार में जितने भी संत-मनीषी हुए हैं, उन्होंने सदा दूसरों के सुख और परोपकार के लिए प्रयत्न किया है। वे उस मां के समान हैं जो सबको पुत्रवत मानती है और सबको खिला-पिलाकर स्वयं खाती पीती है और सबको सुलाकर स्वयं सोती है। उसके सामने 'परÓ का महत्व होता है, 'स्वÓ का नहीं। यही वह तत्व है, जिसके कारण वह स्वयं गीले में सोती है और अपनी संतान को सूखे में सुलाती है। मां स्वयं कष्ट सहन करके भी अपनी संतान को सुख सुविधा पहुंचाने के लिए लालायित रहती है। अगर जीवन को ऊंचाई देनी है, तो बुनियाद उतनी ही गहरी होनी चाहिए। मकान उतना ही ऊंचा और मजबूत बनता है। 'सब सुखी होंÓ की आदर्श स्थिति स्थापित करने के लिए एक साथ अनेक अच्छाइयों का अभ्यास करना होता है। इस कठिन साधना और जीवन मूल्यों की श्रेष्ठता से जुड़कर ही हमारा व्यक्तित्व आदर्श बनता है।


Written by: ज्योतिषाचार्य “पंकज कुमार” 

ईश्वर किस प्रकार कृपा करते है

कोई विपदा आते ही अपने भाग्य पर दोषारोपण करने लगना और ईश्वर की सत्ता पर विश्वास अस्थिर हो उठना एक सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया है। हताशा मन-मस्तिष्क को घेर लेती है। हताशा से समस्या का न तो सही आकलन हो पाता है और न ही उससे जूझने के लिए पर्याप्त शक्ति संयोजित हो पाती है। क्या सदा-सर्वदा निरापद और सुखद जीवन ही सौभाग्य है और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक है? ईश्वर किस प्रकार कृपा करता है, इसे समझना अति आवश्यक है।
ईश्वर की कृपा और सौभाग्य की अनुभूति अन्य जीवों से अपनी तुलना करते ही स्पष्ट होने लगती है। जितने जीव जल में विचरण कर रहे हैं, उतने ही थल पर हैं। उनमें से मनुष्य की शारीरिक रचना सबसे सुगठित और सुचालित है। मनुष्य अपनी इंद्रियों और बौद्धिक चेतना के कारण सभी जीवों में श्रेष्ठ है। यह एक बड़ा उपकार ही मनुष्य के परमात्मा के प्रति किसी भी प्रकार के संदेह को निमरूल सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। मनुष्य योनि का प्राप्त होना जीव को अवसर प्रदान करता है अपने आत्मिक विकास का ताकि वह चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्त हो सके और अपने मूल अर्थात परम शक्ति में विलीन हो सके। मृत्यु के पश्चात शरीर यहीं पंच तत्व में विलीन हो जाता है। जीवात्मा कहां जाती है, यह संसार में किसी को भी ज्ञात नहीं है, किंतु हर मनुष्य जन्म से मृत्यु तक की प्रक्रिया का साक्षी अवश्य बनता है। इसका गंभीर चिंतन, मनन करने के बाद संपूर्ण प्रक्रिया के सामान्य कष्टों का बार-बार संवाहक कौन बनना चाहेगा। अन्य कोई जीव नहीं बस एक मनुष्य ही सौभाग्यशाली है कि इससे मुक्त होने में सफल हो सकता है। इस तरह मनुष्य पर ईश्वर की कृपा अपार है और भाग्य के सारे द्वार खुले हुए हैं। इसके बाद भी विपत्तियां आना और जीवन में दुख आखिर किस ओर इंगित करने वाले हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो विपत्तियों व समस्याओं ने ही मानव कल्याण की राह खोली है। यदि भगवान राम को वनवास हुआ और सीता हरण हुआ तभी मानवता को मर्यादा पुरुषोत्तम का सद प्रेरणाप्रद चरित्र मिला।
महाभारत ने भगवद्गीता का उपहार दिया। कबीर समाज से तिरस्कृत होकर काशी से मगहर गए, तो कबीर वाणी अमर हो गई। सिख गुरुओं की शहादत ने धर्म-संस्कृति और सभ्यता को कालकवलित होने से बचा लिया। विपत्तियां सदैव मनुष्य को निखारने और बड़ी विपत्ति से बचाने के लिए होते हैं।


Written by: ज्योतिषाचार्य “पंकज कुमार”

कब, मृत्यु का भय खत्म हो जाता है

किसी भी कीमत पर किसी भी स्थिति में जीते चले जाने की इच्छा को ही जीवेषणा कहते हैं। सीधे शब्दों में कहें, तो शरीर के साथ उत्पन्न हुए अतिरिक्त मोह को, हमारा शरीर सतत बना रहे और कभी समाप्त न हो, ऐसी कामना का आधार ही जीवेषणा है। शरीर नश्वर है। हम किसी न किसी को रोज मरते देखते हैं। उस क्षण मन में हमें एकबारगी कंपन का अहसास होता है।
ऐसा क्यों होता है? क्या हमने कभी सोचा है? वास्तव में ऐसा हमारे द्वारा शरीर के साथ किए गए तादात्म्य के कारण होता है। हम शरीर के साथ ऐसे एकाकार हो गए हैं कि शरीर को ही स्वयं यानी चेतना मान लिया है। हमारी सत्ता शरीर से भिन्न है और हमें शरीर को उपकरण की तरह उपयोग में लाना है, लेकिन इस बात को हम मानें भी तो कैसे? जब हमारे अनुभव में ये बात आती ही नहीं कि हमारी सत्ता शरीर से भिन्न है। हम इस शरीर को केवल अपना ठिकाना बनाए हुए हैं। शरीर को स्वयं की सत्ता समझ लेने का भ्रम ही हमें यह अहसास कराता है कि मृत्यु के साथ हम स्वयं समाप्त हो जाएंगे। यही नहीं बल्कि शरीर के तादात्म्य के कारण ही हमें युवा, अधेड़ व वृद्ध होने का अहसास होता है। जबकि मन की गति को जरा रोककर अगर हम आत्मस्थित होने की चेष्टा करें, तो हमें अहसास होगा कि हमारे भीतर वह चेतना मौजूद है जो न युवा होती है और न ही वृद्ध। शरीर हमसे भिन्न है और ऊपर-ऊपर ही बदलता है।
चेतना की न तो कोई उम्र होती है और न ही वह नष्ट होती है। नित्य मिल रही जानकारियों और सूचनाओं को हम अपनी स्मृति में एकत्र करते जाते हैं। इस बौद्धिक विकास को ही हम अपना विकास यानी युवा होना, वृद्ध होना और इसका विनाश ही मृत्यु मान लेते हैं। ऐसा स्वाभाविक है। जब तक हमें उस तत्व की झलक नहीं मिलती, जो इस शरीर की वृद्धि व तर्क-वितर्क में उलङो मन के पार है और किसी भी स्थिति में उसके नष्ट होने का कोई उपाय नहीं, तब तक हम शरीर की नश्वरता के पार नहीं जा सकते। वह चेतन तत्व जो हम ही हैं, हमारी ही परम् सत्ता है, इसका अहसास होते ही शरीर से हमारा तादात्मय टूटना आरंभ हो जाता है और मृत्यु भय समाप्त होता चला जाता है। अंतत: यह पता चलता है कि मृत्यु एक खेल है। इस मनोदशा में व्यक्ति के अंतर्मन में मौजूद मृत्यु का भय खत्म हो जाता है।


Written by: ज्योतिषाचार्य “पंकज कुमार” 

Friday, December 11, 2015

कलियुग

कलियुग क्या है ?
कलियुग यानी कि मशीनी युग । इसलिए कलियुग में मनुष्य मशीन की तरह काम करके शांति और संतुष्टि पाना चाहता है किंतु मशीन आदि से त्वरित सुश भले ही मिले पर शास्वत शांति नहीं मिलती । धन कमाना आवश्यक है ।लेकिन सिद्धांत यह है कि कमाएं नीति से, संसार, परिवार में रहें संतों एवं शास्त्रों की बनाई रीति से और प्रभू को भजें प्रीति से । नीति, रीति और प्रीति के त्रिसूत्रात्मक सिद्धांत से मनुष्य आनंदमय जीवन पा सकता है ।