एक अच्छी और सच्ची जिंदगी जीने के लिए मनुष्य के पास उन रास्तों का ज्ञान
होना बहुत जरूरी है, जो उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचाते हैं। इन्हीं रास्तों
पर आगे बढ़ते हुए हर मनुष्य की सब सुखी हों- यह भावना होनी चाहिए। हम अपने
कर्म और वाणी से ऐसा एक भी शब्द न निकालें और न ऐसा कृत्य करें, जो दूसरों
को कष्ट पहुंचाता हो।
यह वाणी के संयम और कर्म के विवेक से ही संभव हो सकता है, लेकिन हमारी स्थिति आज उस सुंदरी की तरह है, जो चाहती है कि सारी दुनिया उसे प्यार करे परंतु वह किसी को प्यार न करे। अक्सर हम भूल जाते हैं कि यह संसार आदान-प्रदान पर चलता है। जैसा हम बोएंगे, वैसा फल हमें मिलेगा। पाश्चात्य दार्शनिक वेंडल विल्की ने लिखा था कि जिस प्रेम, सहिष्णुता, परदुखकातरता, परोपकार, संवेदना और भाईचारे की जरूरत है, उसका लोगों में अभाव है। विल्की का स्वप्न अधूरा ही रह गया। यह स्वप्न कोरा विल्की का ही नहीं महावीर, बुद्ध, गांधी, आचार्य तुलसी जैसे महापुरुषों का भी था, जो अधूरा ही रह गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि आपसी प्रेम और आपसी मेल का अपना महत्व है और उससे वह शक्ति उत्पन्न होती है, जो और किसी चीज से पैदा नहीं हो सकती, लेकिन आज का मानव व्यापक हितों को नजरअंदाज कर अपने निजी स्वार्थों को देख रहा है। वर्तमान समय की सारी व्याधियां इन्हीं क्षुद्र स्वार्थों और संकीर्ण मानसिकता के कारण हैं।
संसार में जितने भी संत-मनीषी हुए हैं, उन्होंने सदा दूसरों के सुख और परोपकार के लिए प्रयत्न किया है। वे उस मां के समान हैं जो सबको पुत्रवत मानती है और सबको खिला-पिलाकर स्वयं खाती पीती है और सबको सुलाकर स्वयं सोती है। उसके सामने 'परÓ का महत्व होता है, 'स्वÓ का नहीं। यही वह तत्व है, जिसके कारण वह स्वयं गीले में सोती है और अपनी संतान को सूखे में सुलाती है। मां स्वयं कष्ट सहन करके भी अपनी संतान को सुख सुविधा पहुंचाने के लिए लालायित रहती है। अगर जीवन को ऊंचाई देनी है, तो बुनियाद उतनी ही गहरी होनी चाहिए। मकान उतना ही ऊंचा और मजबूत बनता है। 'सब सुखी होंÓ की आदर्श स्थिति स्थापित करने के लिए एक साथ अनेक अच्छाइयों का अभ्यास करना होता है। इस कठिन साधना और जीवन मूल्यों की श्रेष्ठता से जुड़कर ही हमारा व्यक्तित्व आदर्श बनता है।
Written by: ज्योतिषाचार्य “पंकज कुमार”
यह वाणी के संयम और कर्म के विवेक से ही संभव हो सकता है, लेकिन हमारी स्थिति आज उस सुंदरी की तरह है, जो चाहती है कि सारी दुनिया उसे प्यार करे परंतु वह किसी को प्यार न करे। अक्सर हम भूल जाते हैं कि यह संसार आदान-प्रदान पर चलता है। जैसा हम बोएंगे, वैसा फल हमें मिलेगा। पाश्चात्य दार्शनिक वेंडल विल्की ने लिखा था कि जिस प्रेम, सहिष्णुता, परदुखकातरता, परोपकार, संवेदना और भाईचारे की जरूरत है, उसका लोगों में अभाव है। विल्की का स्वप्न अधूरा ही रह गया। यह स्वप्न कोरा विल्की का ही नहीं महावीर, बुद्ध, गांधी, आचार्य तुलसी जैसे महापुरुषों का भी था, जो अधूरा ही रह गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि आपसी प्रेम और आपसी मेल का अपना महत्व है और उससे वह शक्ति उत्पन्न होती है, जो और किसी चीज से पैदा नहीं हो सकती, लेकिन आज का मानव व्यापक हितों को नजरअंदाज कर अपने निजी स्वार्थों को देख रहा है। वर्तमान समय की सारी व्याधियां इन्हीं क्षुद्र स्वार्थों और संकीर्ण मानसिकता के कारण हैं।
संसार में जितने भी संत-मनीषी हुए हैं, उन्होंने सदा दूसरों के सुख और परोपकार के लिए प्रयत्न किया है। वे उस मां के समान हैं जो सबको पुत्रवत मानती है और सबको खिला-पिलाकर स्वयं खाती पीती है और सबको सुलाकर स्वयं सोती है। उसके सामने 'परÓ का महत्व होता है, 'स्वÓ का नहीं। यही वह तत्व है, जिसके कारण वह स्वयं गीले में सोती है और अपनी संतान को सूखे में सुलाती है। मां स्वयं कष्ट सहन करके भी अपनी संतान को सुख सुविधा पहुंचाने के लिए लालायित रहती है। अगर जीवन को ऊंचाई देनी है, तो बुनियाद उतनी ही गहरी होनी चाहिए। मकान उतना ही ऊंचा और मजबूत बनता है। 'सब सुखी होंÓ की आदर्श स्थिति स्थापित करने के लिए एक साथ अनेक अच्छाइयों का अभ्यास करना होता है। इस कठिन साधना और जीवन मूल्यों की श्रेष्ठता से जुड़कर ही हमारा व्यक्तित्व आदर्श बनता है।
Written by: ज्योतिषाचार्य “पंकज कुमार”
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